3. उबुन्टु

कहानी का उद्देश्य: प्रतिस्पर्धा (competition) की बजाय सहयोग (cooperation) की भावना का विकास करना।
समय: कम से कम दो दिन बाकी शिक्षक के संतुष्ट होने तक

Check In: कक्षा की शुरूआत 2-3 मिनट श्वास पर ध्यान देने की प्रक्रिया से की जाए।

कहानी:
एक मानव शास्त्री ने कुछ अफ़्रीकन आदिवासी बच्चों को एक खेल खेलने को कहा। उसने एक टोकरी में मिठाइयाँ और कैंडीज़ एक वृक्ष के पास रख दिए। बच्चों को वृक्ष से 100 मीटर दूर खड़ा कर दिया। फिर उसने कहा कि जो बच्चा सबसे पहले पहुँचेगा उसे टोकरी के सारे स्वीट्स मिलेंगे।
जैसे ही उसने - 'रेडी स्टेडी गो' कहा… तो जानते हैं उन छोटे बच्चों ने क्या किया?
सभी ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और एक साथ वृक्ष की ओर दौड़ गए। पास जाकर उन्होंने सारी मिठाइयाँ और कैंडीज़ आपस में बराबर बाँट लिए और मज़े से खाने लगे।
जब उस मानव शास्त्री ने पूछा कि उन लोगों ने ऐसा क्यों किया? तो उन्होंने कहा— “उबुन्टु (Ubuntu)।” जिसका मतलब है- कोई एक व्यक्ति कैसे ख़ुश रह सकता है जब बाकी दूसरे सभी दु:खी हों?
उबुन्टु (Ubuntu) का उनकी भाषा में मतलब है - "मैं हूँ, क्योंकि हम हैं। (I am because we are.)" अर्थात हम सबके साथ होने के कारण ही मैं रह पा रहा हूँ।

चर्चा की दिशा:
यदि मनुष्य को देखा जाए तो हर स्तर पर प्रतिस्पर्धा, हार-जीत, शोषण और विरोध दिखाई पड़ता है। किसी एक की जीत की 'अल्पकालीन ख़ुशी' में अनेक की हार की 'दीर्घकालीन पीड़ा' रहती है। अभी हम ‘जिओ और जीने दो' को मानकर चल रहे हैं जिसका मतलब है पहले अपना जीना पक्का हो जाए बाकी कुछ बचता है तो दूसरे अपना जीना खुद देख लें। इसी सोच के चलते मनुष्य सब कुछ ख़ुशी के लिए करने के बाद भी हमेशा ख़ुश नहीं रह पा रहा है। कोई एक जीतेगा से अच्छी स्थिति है कि कोई न हारे।
इस कहानी और प्रश्नों के माध्यम से विद्यार्थियों का ध्यान पूरकता में जीने की ओर दिलाने का प्रयास किया गया है। इससे उनमें प्रतिस्पर्धा की बजाय सहयोगिता की भावना का विकास होगा। इससे ‘जिओ और जीने दो' की बजाय 'जीने दो और जिओ' के प्राकृतिक सिद्धांत को समझकर सभी मिलजुल कर रहने के लिए प्रेरित होंगे। इससे प्रतिस्पर्धा अर्थात दूसरों से आगे निकलने की भावना के बजाय एक-दूसरे की उन्नति में सहयोगी होने की भावना विकसित होती है जो कि सभी की उन्नति और ख़ुशी के लिए आवश्यक है।

पहला दिन:

चर्चा के लिए प्रश्न:
1. क्या आप कभी दूसरे के ख़ुश रहने में सहयोगी हुए हैं? कब और कैसे? चर्चा करें।
2. क्या आप अपने छोटे-भाई बहन के साथ खेलते हुए कभी जानबूझ कर हारे हैं? आपने ऐसा क्यों किया था?
3. एक ऐसा खेल जिसमें हार-जीत होती है और एक ऐसा खेल जिसमें कोई नहीं हारता है- दोनों में से कौनसा खेल बेहतर है और क्यों? कक्षा में चर्चा करें।

घर जाकर देखो, पूछो, समझो (विद्यार्थियों के लिए):
  • घर जाकर इस कहानी को अपने परिवार में सुनाएँ और इस पर परिवार के सदस्यों के विचार व अनुभव जानें। 
  • अपने परिवार के बड़े या बुजुर्ग लोगों से चर्चा करें कि वे अपने बचपन में कौन-कौनसे खेल खेलते थे। पता करें कि क्या वे कोई ऐसा खेल भी खेलते थे जिसमें किसी की भी हार न होती हो।
Check out: कक्षा के अंत में 1-2 मिनट, शांति से बैठकर आज की चर्चा के निष्कर्ष के बारे में विचार करें।
दूसरा दिन:

Check In: कक्षा की शुरूआत 2-3 मिनट श्वास पर ध्यान देने की प्रक्रिया से की जाए।
  • कहानी की पुनरावृत्ति विद्यार्थियों द्वारा करवाई जाए। पुनरावृत्ति के लिए एक या कई विद्यार्थियों से कहानी सुनना, कहानी का रोल प्ले करना, जोड़े में एक-दूसरे को कहानी सुनाना आदि विविध तरीके अपनाए जा सकते हैं। 
  • कहानी पर घर से मिले फीडबैक को विद्यार्थी छोटे समूहों में साझा कर सकते हैं। कुछ विद्यार्थियों को घर के अनुभव कक्षा में साझा करने के अवसर दिए जाएँ। 
  • पहले दिन के चर्चा के लिए प्रश्नों का प्रयोग उन विद्यार्थियों के लिए पुन: किया जा सकता है जो रह गए थे या अनुपस्थित थे। 
चर्चा के लिए कुछ अन्य प्रश्न:
1. क्या आप किसी हार-जीत वाले खेल में ऐसा बदलाव कर सकते हैं जिसमें कोई भी न हारे?
2. छोटे समूहों में मिलकर ऐसे नए खेल बनाओ जिनमें किसी की भी हार न होती हो। प्रत्येक समूह अपने इस नए खेल को कक्षा में साझा करे।

Check out: कक्षा के अंत में 1-2 मिनट, शांति से बैठकर आज की चर्चा के निष्कर्ष के बारे में विचार करें।

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